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| Last Updated:14/11/2018

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सिकुड़ रही है हिमालय की बर्फ, नई झीलों का बढ़ रहा आका

एक अध्ययन की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड में 738 वर्ग किमी ‘स्नो कवर’ घटा
सिकुड़ रही है हिमालय की बर्फ, नई झीलों का बढ़ रहा आकार
सुधाकर भट्ट
देहरादून। उत्तराखंड की जलवायु में बदलाव की वजह से यहां का हर ग्लेशियर क्षेत्र सिकुड़ रहा है। उत्तराखंड के पर्यावरण पर जारी हाल की रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश में बर्फ से ढका क्षेत्र (स्नो कवर एरिया) करीब एक दशक में 738.34 वर्ग किलोमीटर तक घट गया है। चिंता की बात यह भी है कि कुछ नदियों के मुहाने के ग्लेशियर बिल्कुल गायब हो चुके हैं। यूकास्ट (उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद) और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की संयुक्त अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड में करीब 11 जल संग्रहण क्षेत्र हैं। इनमें स्नो कवर में कमी पाई गई है। सेटेलाइट डाटा के मुताबिक पहले उत्तराखंड में स्नो कवर एरिया 4884.29 वर्ग किलोमीटर था, जो अब घटकर 4145.95 वर्ग किलोमीटर रह गया है। ग्लेशियर के पीछे खिसकने से नीति (स्थान) के पास धौली गंगा और भागीरथी जल संग्रहण क्षेत्र में दो नई झीलें भी बनी हैं। ये झीलें उत्तराखंड के गढ़वाल में 16-17 जून को आई आपदा की याद दिला रही हैं। तब चोराबारी झील के टूटने से केदारनाथ को तबाही का मंजर देखना पड़ा था। बर्फबारी और बर्फ क्षेत्र का कम होना प्रदेश के हिमालयी क्षेत्रों से निकल रही नदियों की सेहत के लिए खतरनाक माना जा रहा है। हिमालयी ग्लेशियर से निकलने वाली सरयू के मुहाने पर अब ग्लेशियर नहीं है। इसी तरह रामगंगा और पिंडर दोनों नदियों के ग्लेशियर क्षेत्र में स्नो कवर घटकर 1.3 और 8.6 प्रतिशत रह गया है। वहीं, ग्लेशियरों के सिकुड़ने से पिथौरागढ़ जिले में धौली गंगा क्षेत्र में करीब एक वर्ग किलोमीटर की झील बन गई है। इस झील का आकार बढ़ रहा है। इसी तरह भागीरथी जल संग्रहण क्षेत्र में करीब 4700 मीटर की ऊंचाई पर भी एक झील बन गई है। 1990 में इस स्थान पर कोई झील नहीं थी।
हिमाचल में बर्फबारी का समय बदला लेकिन दायरा बढ़ा
शिमला। मौसम विज्ञान केंद्र शिमला के निदेशक मनमोहन सिंह का कहना है कि हिमाचल में बर्फबारी के समय में कुछ बदलाव हुआ है, लेकिन स्नो लाइन का दायरा कम नहीं हुआ है। अब नवंबर के बजाय दिसंबर से स्नो सीजन शुरू हो रहा है। कई बार कांगड़ा और सोलन के मैदानी इलाकों में भी हिमपात हो जाता है।
घटते स्नो कवर के प्रभाव
भू-कटान और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ेंगी
नदियों का प्रवाह प्रभावित होगा
मानसून में बाढ़ की आशंका बढ़ेगी
वनस्पतियों की पैदावार प्रभावित हो सकती है
नदियों में जल की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा
सरयू समेत अन्य नदियों के मुहाने पर ग्लेशियर बिल्कुल नदारद
सरयू नदी के मुहाने से ग्लेशियर गायब होने से नदी का जलप्रवाह अनियमित हो जाएगा। बरसात में नदी उफान पर रहेगी, लेकिन बाकी मौसम में पानी का स्तर बिल्कुल घट जाएगा। सबसे बुरा असर भूजल पर पड़ेगा। पहाड़ों के साथ-साथ मैदानी क्षेत्रों में वनस्पतियां प्रभावित होंगी। -डीपी डोभाल, ग्लेशियर एक्सपर्ट

Amar Ujala (26-12-2013)